आजकल समाज में बच्चों के अंदर इंटरनेट के बढ़ते प्रयोग के दुष्प्रभाव को साफ देखा जा सकता है। किताबों और परिवार से दूरी मोबाईल और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग का नकारात्मक पहलु माना जा सकता है। ऐसे में परिवार और विद्यालय की महति जिम्मेदारी बनती है कि समय रहते इनपर विशेष ध्यान दें। बच्चों में संस्कार परिवार और समाज के बाद विद्यालय से प्राप्त होता है। आज बहुत सारे विद्यालय में रटने की प्रवृत्ति ने बच्चों को रटंतू तोता तो बना दिया परंतु एक सच्चे मानव के गुण को कोसो दूर कर दिया। पहले पुस्तकें कम हुआ करती थीं, परंतु इतनी बालकों में तनाव और प्रतिस्पर्धा नहीं दिखती थी। आज बच्चे अपनी पढाई तनाव में पूर्ण करते हैं और हमेशा खिन्न रहते हैं। जिसके वजह से वे ठीक व्यवहार भी नही कर पाते। उन्हें नहीं पता कि वे अपनी मशीनी जिंदगी को जी नहीं बल्कि ढो रहे होते हैं।
ऐसे में बच्चों को उनके सामर्थ के मुताबिक काम का बोझ देना ठीक प्रतीत होता है क्योंकि बच्चे जब अपनी पढाई को रूचि के साथ पूरी करेंगे तो स्थाई और टिकाऊ होगा। उनके अंदर बड़ों के प्रति आदर, छोटों के प्रति स्नेह, और समकक्षों के प्रति प्रेम की भावना जागृत करना बहुत जरुरी है। अनुशासन का पाठ बचपन में ही समझाना उनके भविष्य के लिए उत्तम है।
कहने का तात्पर्य यह है कि बाल मनोविज्ञान के आधार पर उनकी कोमल भावनाओं को पोषित करते हुए उन्नयन करना होगा। यह एक माता-पिता, शिक्षक, और समाज का दायित्व बनता है कि आने वाले भविष्य को संजोये और सवाँरे।
टिप्पणियाँ
Good..!
जवाब देंहटाएं